Wednesday 3 December 2014

छुट्टी के दिन




।। छुट्टी के दिन ।।

दो मित्र आपस में मिलते हैं और अपने छुट्टी के दिन को पूर्ण करने के पश्चात एक दूसरे के अनुभव को साझा करते हैं ।
रवि: नमस्ते राहुल
राहुल: नमस्ते रवि, कैसे हो, तुम्हारी छुट्टी कैसी बीती ?
रवि: बहुत अच्छी रही
राहुल: तुम छुट्टी मनानें कहाॅं गये थे ?
रवि: मै तो सबरीमाला गया था। वहाॅं पर हम ने नीलीपहाड़ी, करीपहाड़ी देखा।
राहुल: वहाॅं का मौसम कैसा था ?
रवि: वहाॅं का मौसम ठंढा था।
राहुल: वहाॅं पर जंगल भी है क्या ?
रवि: हाॅं ! वो पूरा क्षेत्र बड़े - बड़े वृक्षों से घिरा है। जिसमें तेग, ईटी, आम, कटहल, शाक और जंगली बबूल के वृक्ष हैं। जिनसे हमें फल और लकड़ी प्राप्त होती है।
और तुम किधर गये थे, राहुल ?
राहुल: मै अपने पिता जी के साथ उनकी तेल शोधक कम्पनी गया था।
रवि: क्या देखा वहाॅ पर ?
राहुल: बड़ी - बड़ी मशीनें, आधुनिक तरह से कार्य करने वाले स्वाचालित यंत्र और तेल शोधन की कार्य प्रणाली के बारे में भी जाना।
रवि: क्या - क्या बनता है आपके पिता जी की कम्पनी में ?
राहुल: मिट्टी का तेल, पेट््रोल, डीजल, वायुयान तेल और बहुत सारी उपयोगी गैसें जैसे घरेलू गैस आदि।
रवि: तुमने तो बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक जानकारी दी।
राहुल: हाॅ, और तुम्हारे साथ सबरीमाला कौन-कौन घूमने गया था ?
रवि: मै मेरी अम्मा जी, पिता जी और मेरी छोटी बहन मेघना भी मेरे साथ गई थी।
राहुल: अच्छा रवि चलो घर चलते है। वहाॅं और सारी बातें होगी।
रवि: आज नही मित्र ! किसी दूसरे दिन हम अपने पिता जी और अम्मा जी के साथ आयेगे।
राहुल: अच्छा नमस्ते ! चलते हैं। फिर मिलेगे। धन्यवाद !

- उमेश मौर्य

Thursday 16 January 2014

धरोहर

धरोहर 













भावनाए दिखती नहीं है
एहसास की जाती है
दिखता नहीं
दर्द
अनुभव किया जाता  है
मात्र
दर्द का दर्द से
मिलान करके |
सजो सकते है
किसी कविता में,
कहानी में,
गीत में,
और बाँट सकते हैं
किसी का दर्द, पीड़ा, प्रेम
स्नेह, दुःख -सुख ,
धूप और सर्द |
धरोहर है ये साहित्य वर्तमान की
भविष्य के लिए |
हमारे लिए
अतीत की सीढ़ी है
जिससे हम लौट सकते है
अपने पूर्वजों के पास
जिन्होंने हमें लिखना सिखाया
कविता सिखाया
गीत सिखाया
और संसार की हर चीज
को रखना
सिखाया
माध्यम से
साहित्य के
रचना से
रचनाकार बनना सिखाया

- उमेश मौर्य